अन्य दुआएँ

सलाम, शुक्र, तारीफ़, छींक, ग़ुस्से और रोज़मर्रा के उन मौक़ों की दुआएँ जो बड़े समूहों में नहीं आते।

27 दुआएँ

छींक आने पर की दुआ

إِذَا عَطَسَ أَحَدُكُم فَلْيَقُلِ (الْحَمْدُ لِلَّهِ)،وَلْيَقُلْ لَهُ أَخُوهُ أَوْ صَاحِبُهُ: (يَرْحَمُكَ اللَّهُ)،فَإِذَا قَالَ لَهُ: (يَرحَمُكَ اللَّهُ)، فَلْيَقُلْ: (يَهْدِيكُمُ اللَّهُ وَيُصْلِحُ بَالَكُمْ)

When you sneeze , then say : Alḥamdulillāh Your companion should say : Yarḥamukallāh When someone says Yarḥamukallāh to you then you should say: Yahdīkumu ‘llāhu wa yuṣliḥu bālakum.

जब तुम्हें छींक आए तो कहो: सारी तारीफ़ और शुक्र अल्लाह के लिए है। तुम्हारा साथी कहे: अल्लाह तुम पर रहम करे। जब कोई तुमसे «यरहमुकल्लाह» कहे तो तुम कहो: अल्लाह तुम्हें हिदायत दे और तुम्हारे मामले दुरुस्त कर दे।

Al-Bukhari 7/125

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जब कोई ग़ैर-मुस्लिम छींककर अल्हम्दुलिल्लाह कहे

يَهْديكُمُ اللهُ وَيُصْلِحُ بالَكُم

Yahdīkumullāhu wa yuṣliḥu bālakum.

अल्लाह तुम्हें हिदायत दे और तुम्हारे मामले दुरुस्त कर दे।

At-Tirmidhi 5/82

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ग़ुस्से के समय की दुआ

أَعوذُ بِاللهِ مِنَ الشَّيْطانِ الرَّجيم

A`ūdhu billāhi minash-Shayṭānir-rajīm.

मैं मरदूद शैतान से अल्लाह की पनाह माँगता हूँ।

Al-Bukhari 7/99

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किसी को आज़माइश में देखकर की दुआ

الْحَمْدُ للهِ الّذي عافاني مِمّا ابْتَلاكَ بِهِ،وَفَضَّلَني عَلى كَثيرٍ مِمَّنْ خَلَقَ تَفْضيلا

Alhamdu lillāhi ‘l-ladhī `āfānī mimmab-talāka bihi wa faḍḍalanī `alā kathīrin mimman khalaqa tafḍīlā.

सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है जिसने मुझे उससे बचाया जिसमें उसने तुम्हें मुब्तला किया, और मुझे अपनी बहुत-सी मख़लूक़ पर बड़ी फ़ज़ीलत दी।

At-Tirmidhi 5/493,4

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अल्लाह के लिए मोहब्बत का इज़हार करने वाले के लिए दुआ

أَحَبَّكَ الّذي أَحْبَبْتَني لَه

Aḥabbaka ‘lladhī aḥbabtanī lah.

जिसके लिए तुम मुझसे मोहब्बत करते हो वह अल्लाह भी तुमसे मोहब्बत करे।

Abu Dawud 4/333

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क़र्ज़ चुकाए जाने पर क़र्ज़दार के लिए दुआ

بارَكَ اللهُ لَكَ في أَهْلِكَ وَمالِك،إِنَّما جَزاءُ السَّلَفِ الْحَمْدُ والأَداء

Bārakallāhu laka fī ahlika wa mālik, innamā jazā'us-salafi ‘l-ḥamdu wa‘l-adā'.

अल्लाह तुम्हारे घर वालों और माल में बरकत दे, बेशक क़र्ज़ का बदला शुक्रिया और (ली हुई चीज़) लौटाना है।

Ibn Majah 2/809

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बदशगुनी से बचने की दुआ

اللّهُمَّ لا طَيْرَ إِلاّ طَيْرُك،وَلا خَيْرَ إِلاّ خَيْرُك،وَلا إِلهَ غَيْرُك

Allāhumma lā ṭayra illā ṭayruk, wa lā khayra illā khayruk, wa lā ilāha ghayruk.

ऐ अल्लाह! तेरे शगुन के सिवा कोई शगुन नहीं, तेरी भलाई के सिवा कोई भलाई नहीं, और तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।

Ahmad 2/220

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ख़ुशी या नागवार ख़बर मिलने पर की दुआ

كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم إِذَا أَتَاهُ الْأَمْرُ يَسُرُّهُ قَالَ: (الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي بِنِعْمَتِهِ تَتِمُّ الصَّالِحَاتُ) وَإِذَا أَتَاهُ الْأَمْرُ يَكْرَهُهُ قَالَ: (الْحَمْدُ لِلَّهِ عَلَى كُلِّ حَالٍ)

When something happened that pleased him, the Prophet (ﷺ) used to say: Alḥamdu lillāhi ‘lladhi bi ni`matihi tatimmuṣ-ṣāliḥāt. And if something happened that displeased him, he used to say: Alḥamdu lillāhi `alā kulli ḥāl.

जब नबी ﷺ को कोई ऐसी बात पेश आती जो आपको ख़ुश करती तो फ़रमाते: सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है जिसकी नेमत से नेक काम मुकम्मल होते हैं। और जब कोई नागवार बात पेश आती तो फ़रमाते: हर हाल में प्रशंसा अल्लाह के लिए है।

Al-Hakim who graded it authentic 1/499

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नबी ﷺ पर दुरूद भेजने की फ़ज़ीलत (1)

قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم: (مَنْ صَلَّى عَلَيَّ صَلاَةً صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ بِهَا عَشْراً)

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नबी ﷺ ने फ़रमाया: “जो मुझ पर एक बार दुरूद भेजता है, अल्लाह उसके बदले उस पर दस बार रहमत नाज़िल फ़रमाता है।”

Muslim 1/288

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नबी ﷺ पर दुरूद भेजने की फ़ज़ीलत (2)

وَقَالَ صلى الله عليه وسلم: (لاَ تَجْعَلُوا قَبْرِي عِيداً وَصَلُّوا عَلَيَّ؛ فَإِنَّ صَلاَتَكُم تَبْلُغُنِي حَيْثُ كُنْتُمْ)

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नबी ﷺ ने फ़रमाया: “मेरी क़ब्र को मेले की जगह न बनाओ, बल्कि मुझ पर दुरूद भेजो, क्योंकि तुम्हारा दुरूद मुझे पहुँच जाता है तुम जहाँ भी हो।”

Abu Dawud 2/218

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नबी ﷺ पर दुरूद भेजने की फ़ज़ीलत (3)

وَقَالَ صلى الله عليه وسلم: (الْبَخِيلُ مَنْ ذُكِرْتُ عِنْدَهُ فَلَمْ يُصَلِّ عَلَيَّ)

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नबी ﷺ ने फ़रमाया: “कंजूस वह है जिसके सामने मेरा ज़िक्र हो और वह मुझ पर दुरूद न भेजे।”

At-Tirmidhi 5/551

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नबी ﷺ पर दुरूद भेजने की फ़ज़ीलत (4)

وَقَالَ صلى الله عليه وسلم:(إِنَّ لِلَّهِ مَلاَئِكَةً سَيَّاحِينَ فِي الْأَرْضِ يُبَلِّغُونِي مِنْ أُمَّتِي السَّلاَمَ)

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नबी ﷺ ने फ़रमाया: “बेशक अल्लाह के कुछ फ़रिश्ते ज़मीन में घूमते रहते हैं और मेरी उम्मत का सलाम मुझ तक पहुँचाते हैं।”

An-Nasa'i, Al-Hakim 2/421

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नबी ﷺ पर दुरूद भेजने की फ़ज़ीलत (5)

وَقَالَ صلى الله عليه وسلم: (مَا مِنْ أَحَدٍ يُسَلِّمُ عَلَيَّ إِلاَّ رَدَّ اللَّهُ عَلَيَّ رُوحِيَ حَتَّى أَرُدَّ عَلَيْهِ السَّلاَمَ)

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नबी ﷺ ने फ़रमाया: “कोई मुझ पर सलाम नहीं भेजता मगर अल्लाह मेरी रूह मुझे लौटा देता है ताकि मैं उसके सलाम का जवाब दूँ।”

Abu Dawud 1/383

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सलाम आम करने की फ़ज़ीलत (1)

قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم: (لاَ تَدْخُلُوا الْجَنَّةَ حَتَّى تُؤْمِنُوا، وَلاَ تُؤْمِنُوا حَتَّى تَحَابُّوا، أَوَلاَ أَدُلُّكُم عَلَى شَيْءٍ إِذَا فَعَلْتُمُوهُ تَحَابَبْتُم، أَفْشُوا السَّلاَمَ بَيْنَكُمْ)

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नबी ﷺ ने फ़रमाया: “तुम जन्नत में दाख़िल नहीं होगे जब तक ईमान न लाओ, और तुम ईमान वाले नहीं होगे जब तक एक-दूसरे से मोहब्बत न करो। क्या मैं तुम्हें ऐसी चीज़ न बताऊँ जिसे करने से तुम एक-दूसरे से मोहब्बत करने लगो? आपस में सलाम को आम करो।”

Muslim 1/74

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सलाम आम करने की फ़ज़ीलत (2)

ثَلاَثٌ مَنْ جَمَعَهُنَّ فَقَدْ جَمَعَ الْإِيمَانَ: الْإِنْصَافُ مِنْ نَفْسِكَ، وَبَذْلُ السَّلاَمِ لِلْعَالَمِ، وَالْإِنْفَاقُ مِنَ الإِقْتَارِ

तीन ख़सलतें हैं, जिसमें ये जमा हो गईं उसने अपना ईमान मुकम्मल कर लिया: इंसाफ़ करना, सब लोगों को सलाम करना और अपनी थोड़ी-सी कमाई में से (सदक़े के तौर पर) ख़र्च करना।

Al-Bukhari

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सलाम आम करने की फ़ज़ीलत (3)

وَعَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا: أنَّ رَجُلاً سَأَلَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أيُّ الْإِسْلاَمِ خَيْرٌ قَالَ: (تُطْعِمُ الطَّعَامَ، وَتَقْرأُ السَّلاَمَ عَلَى مَنْ عَرَفْتَ وَمَنْ لَمْ تَعْرِفْ)

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अब्दुल्लाह बिन उमर (र.अ.) ने कहा: एक शख़्स ने नबी ﷺ से पूछा: “इस्लाम का सबसे बेहतर अमल कौन-सा है?” आपने फ़रमाया: “खाना खिलाना और सलाम करना, उन्हें भी जिन्हें तुम जानते हो और उन्हें भी जिन्हें नहीं जानते।”

Muslim 1/65

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ग़ैर-मुस्लिम के सलाम का जवाब

إذَا سَلَّمَ عَلَيْكُمْ أَهْلُ الْكِتَابِ فَقُولُوا: وَعَلَيْكُمْ

If one of the People of the Scripture (i.e. Christians and Jews) greets you, saying As-Salāmu `alaykum, then say (to him): Wa `alaykum.

अगर अहले-किताब (यानी यहूदी या ईसाई) में से कोई तुम्हें «अस्सलामु अलैकुम» कहे तो (उसे) कहो: वअलैकुम (और तुम पर भी)।

Muslim 4/1705

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मुर्ग़ की बाँग या गधे की आवाज़ सुनकर की दुआ

إِذَا سَمِعْتُمْ صِيَاحَ الدِّيَكَةِ فَاسْأَلُوا اللَّهَ مِنْ فَضْلِهِ؛ فَإِنَّهَا رَأَتْ مَلَكاً وَإِذَا سَمِعْتُمْ نَهِيقَ الْحِمَارِ فَتَعَوَّذُوا بِاللَّهِ مِنَ الشَّيطَانِ؛ فَإِنَّهُ رَأَى شَيْطَاناً

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जब तुम मुर्ग़ की बाँग सुनो तो अल्लाह से उसका फ़ज़्ल माँगो, क्योंकि उसने कोई फ़रिश्ता देखा है। और जब तुम गधे की आवाज़ सुनो तो शैतान से अल्लाह की पनाह माँगो, क्योंकि उसने कोई शैतान देखा है।

Muslim 4/2092

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रात में कुत्तों के भौंकने पर की दुआ

إِذَا سَمِعْتُمْ نُبَاحَ الْكِلاَبِ وَنَهِيقَ الْحَمِيرِ بِاللَّيْلِ فَتَعَوَّذُوا بِاللَّهِ مِنْهُنَّ؛ فَإِنَّهُنَّ يَرَيْنَ مَا لاَ تَرَوْنَ

जब तुम रात को कुत्ते के भौंकने या गधे की आवाज़ सुनो तो उनसे अल्लाह की पनाह माँगो, क्योंकि वे वह कुछ देखते हैं जो तुम नहीं देखते।

Abu Dawud 4/327

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जिसे आपने बुरा-भला कहा हो उसके लिए दुआ

قال صلى الله عليه وسلم: «اللَّهُم فأيما مؤمن سببته فاجعل ذلك له قربة إليك يوم القيامة»

Allāhumma fa'ayyumā mu'minin sababtuhu faj`al dhālika lahu qurbatan ilayka yawma ‘l-qiyāmah.

ऐ अल्लाह! मैंने जिस मोमिन को बुरा-भला कहा हो, उसके बदले क़यामत के दिन उसे क़ुर्बानी का सवाब अता फ़रमा।

Muslim 4/2007

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किसी मुसलमान की तारीफ़ का अदब

قال صلى الله عليه وسلم: «إِذَا كَانَ أَحَدُكُم مَادِحاً صَاحِبَهُ لاَ مَحَالَةَ فَلْيَقُلْ: أَحْسِبُ فُلاَناً وَاللَّهُ حَسِيبُهُ، وَلاَ أُزَكِّي عَلَى اللَّهِ أَحَداً، أَحْسِبُهُ – إِنْ كَانَ يَعْلَمُ ذَاكَ – كَذَا وَكَذَا»

If any of you praises his companion then let him say: Aḥsibu fulānan wallāhu ḥasībuh wa lā uzakkī `alallāhi aḥada.

अगर तुममें से कोई अपने साथी की तारीफ़ करे तो कहे: मैं फ़लाँ शख़्स को ऐसा समझता हूँ, और अल्लाह उसका हिसाब लेने वाला है, (यानी: और मैं अल्लाह के सामने किसी को पाक नहीं ठहरा सकता) अगर उसे यह (अच्छी ख़सलत) ऐसी मालूम हो (उस शख़्स में जो बात क़ाबिल-ए-तारीफ़ समझता हो वह कहे)।

Muslim 4/2296

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जिसकी तारीफ़ की जाए उसकी दुआ

اللَّهُمَّ لاَ تُؤَاخِذْنِي بِمَا يَقُولُونَوَاغْفِرْ لِي مَا لاَ يَعْلَمُونَ
[وَاجْعَلْنِي خَيْرًا مِمَّا يَظُّنُّونَ]

Allāhumma lā tu'ākhidhnī bimā yaqūlūn, waghfir lī mā lā ya`lamūn [waj`alnī khayran mimmā yaẓunnūn].

ऐ अल्लाह! जो कुछ ये कहते हैं उस पर मुझसे मुवाख़ज़ा न कर, और जो ये नहीं जानते उस पर मुझे बख़्श दे [और मुझे उससे बेहतर बना दे जो ये गुमान करते हैं]।

Al-Bayhaqi, Shu'ab Al-Iman 4/228

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ज़बह या क़ुर्बानी करते समय की दुआ

بِسْمِ اللَّهِوَاللَّهُ أَكْبَرُ
[اللَّهُمَّ مِنْكَ وَلَكَ]
اللَّهُمَّ تَقَبَّلْ مِنِّي

Bismillāh wallāhu Akbar [Allāhumma minka wa lak] Allāhumma taqabbal minnī.

अल्लाह के नाम से, अल्लाह सबसे बड़ा है! [ऐ अल्लाह! तेरी ओर से है और तेरी ही ओर है।] ऐ अल्लाह! इसे मुझसे क़ुबूल फ़रमा।

Muslim 3/1557

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भलाई और अख़लाक़ की जामे दुआएँ

إِذَا كَانَ جُنْحُ اللَّيْلِ – أَوْ أَمْسَيْتُم – فَكُفُّوا صِبْيانَكُم، فَإِنَّ الشَّيَاطِينَ تَنْتَشِرُ حِينَئِذٍ، فَإِذَا ذَهَبَ سَاعَةٌ مِنَ اللَّيلِ فَخَلُّوهُمْ، وَأَغْلِقُوا الأَبْوَابَ وَاذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ؛ فَإِنَّ الشَّيطَانَ لاَ يَفْتَحُ بَاباً مُغلَقاً، وَأَوْكُوا قِرَبَكُمْ، وَاذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ، وَخَمِّرُوا آنِيَتَكُم، وَاذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ، وَلَوْ أَنْ تَعْرُضُوا عَلَيْهَا شَيْئاً، وَأَطْفِئُوا مَصَابِيحَكُمْ.

जब रात हो जाए तो अपने बच्चों को (बाहर जाने से) रोको क्योंकि उस वक़्त शैतान फैल जाते हैं। जब रात का एक हिस्सा गुज़र जाए तो उन्हें छोड़ दो। अपने दरवाज़े बंद करो और अल्लाह का नाम लो, क्योंकि शैतान बंद दरवाज़ा नहीं खोलता। अपनी मश्कें बाँधो और अल्लाह का नाम लो, अपने बर्तन किसी चीज़ से ढक दो और अल्लाह का नाम लो, और अपने चराग़ बुझा दो।

Al-Bukhari with Al-Fath 10/88

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मौक़े के अनुसार दुआएँ