जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए (3 में से 2)
जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए। मरीज़ की इयादत, दर्द, जनाज़ा, ताज़ियत।
“जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” के अंतर्गत कौन-सी दुआ है?
हिस्न अल-मुस्लिम में “जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” के अंतर्गत आने वाली 3 दुआओं में से एक इस तरह शुरू होती है: “Lā ilāha illallāh”, और इसका अर्थ है: “अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं”। स्रोत: Al-Bukhari, और यह हिस्न अल-मुस्लिम में संकलित है।
जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए: अरबी पाठ
उच्चारण (लिप्यंतरण)
As he was dying, the Prophet (ﷺ) dipped his hands in water and wiped his face saying: Lā ilāha illallāh inna li ‘lmawti la’sakarāt.
हिंदी अर्थ
अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, बेशक मौत की सख़्तियाँ हैं।
कब और कैसे पढ़ें
हिस्न अल-मुस्लिम ने यह दुआ “जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” शीर्षक के अंतर्गत दी है।
स्रोत में दोहराने की कोई निश्चित संख्या नहीं दी गई है।
यह दुआ कहाँ से है?
यह दुआ हिस्न अल-मुस्लिम से है, जो क़ुरआन और सुन्नत की दुआओं का संग्रह है और सईद बिन अली अल-क़हतानी ने संकलित किया। स्रोत: Al-Bukhari।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
“जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” के अंतर्गत कौन-सी दुआ है?
हिस्न अल-मुस्लिम में “जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” के अंतर्गत आने वाली 3 दुआओं में से एक इस तरह शुरू होती है: “Lā ilāha illallāh”, और इसका अर्थ है: “अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं”। स्रोत: Al-Bukhari, और यह हिस्न अल-मुस्लिम में संकलित है।
“जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” की दुआ का अर्थ क्या है?
अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, बेशक मौत की सख़्तियाँ हैं।
“जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” की दुआ कैसे पढ़ी जाती है?
उच्चारण (लिप्यंतरण): Lā ilāha illallāh inna li ‘lmawti la’sakarāt.
“जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” की दुआ का स्रोत क्या है?
Al-Bukhari। यह दुआ हिस्न अल-मुस्लिम में है, जो क़ुरआन और सुन्नत की दुआओं का संग्रह है।
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