जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए (3 में से 1)

जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए। मरीज़ की इयादत, दर्द, जनाज़ा, ताज़ियत।

“जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” के अंतर्गत कौन-सी दुआ है?

हिस्न अल-मुस्लिम में “जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” के अंतर्गत आने वाली 3 दुआओं में से एक इस तरह शुरू होती है: “Allāhumma’ghfir lī warḥamnī”, और इसका अर्थ है: “ऐ अल्लाह! मुझे बख़्श दे और मुझ पर रहम फ़रमा”। स्रोत: Al-Bukhari 7/10, और यह हिस्न अल-मुस्लिम में संकलित है।

जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए: अरबी पाठ

أللّهُمَّ اغْفِرْ لي وَارْحَمْنيوَأَلْحِقْني بِالرَّفيقِ الأّعْلى

उच्चारण (लिप्यंतरण)

Allāhumma’ghfir lī warḥamnī wa alḥiqnī bir-rafīqi ‘l-'A`alā.

हिंदी अर्थ

ऐ अल्लाह! मुझे बख़्श दे और मुझ पर रहम फ़रमा, और मुझे सबसे बुलंद साथियों (जन्नत में) के साथ मिला दे।

कब और कैसे पढ़ें

हिस्न अल-मुस्लिम ने यह दुआ “जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” शीर्षक के अंतर्गत दी है।

स्रोत में दोहराने की कोई निश्चित संख्या नहीं दी गई है।

यह दुआ कहाँ से है?

यह दुआ हिस्न अल-मुस्लिम से है, जो क़ुरआन और सुन्नत की दुआओं का संग्रह है और सईद बिन अली अल-क़हतानी ने संकलित किया। स्रोत: Al-Bukhari 7/10।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

“जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” के अंतर्गत कौन-सी दुआ है?

हिस्न अल-मुस्लिम में “जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” के अंतर्गत आने वाली 3 दुआओं में से एक इस तरह शुरू होती है: “Allāhumma’ghfir lī warḥamnī”, और इसका अर्थ है: “ऐ अल्लाह! मुझे बख़्श दे और मुझ पर रहम फ़रमा”। स्रोत: Al-Bukhari 7/10, और यह हिस्न अल-मुस्लिम में संकलित है।

“जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” की दुआ का अर्थ क्या है?

ऐ अल्लाह! मुझे बख़्श दे और मुझ पर रहम फ़रमा, और मुझे सबसे बुलंद साथियों (जन्नत में) के साथ मिला दे।

“जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” की दुआ कैसे पढ़ी जाती है?

उच्चारण (लिप्यंतरण): Allāhumma’ghfir lī warḥamnī wa alḥiqnī bir-rafīqi ‘l-'A`alā.

“जब मरीज़ ज़िंदगी से मायूस हो जाए” की दुआ का स्रोत क्या है?

Al-Bukhari 7/10। यह दुआ हिस्न अल-मुस्लिम में है, जो क़ुरआन और सुन्नत की दुआओं का संग्रह है।

और दुआएँ: बीमारी, मौत और ताज़ियत · सभी दुआएँ