सफ़ा और मरवा पर की दुआ

सफ़ा और मरवा पर की दुआ। सफ़र, शहर, हज और उमरा।

“सफ़ा और मरवा पर की दुआ” के अंतर्गत कौन-सी दुआ है?

“सफ़ा और मरवा पर की दुआ” के अंतर्गत आने वाली दुआ इस तरह शुरू होती है: “Innaṣ-Ṣafā wa ‘l-Marwata min sha`ā'irillāh”, और इसका अर्थ है: “बेशक सफ़ा और मरवा अल्लाह की निशानियों में से हैं। मैं उसी से शुरू करता हूँ जिससे अल्लाह ने शुरू किया”। स्रोत: Muslim 2/888, और यह हिस्न अल-मुस्लिम में संकलित है।

सफ़ा और मरवा पर की दुआ: अरबी पाठ

(لَمَّا دَنَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم مِنَ الصَّفَا قَرَأَ: ﴿إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَآئِرِ اللَّهِ﴾ «أَبْدَأُ بِمَا بَدَأَ اللَّهُ بِهِ» فَبَدَأَ بِالصَّفَا فَرَقِيَ عَلَيْهِ حَتَّى رَأَى الْبَيْتَ، فَاسْتَقْبَلَ الْقِبْلَةَ، فَوَحَّدَ اللَّهَ وَكبَّرَهُ وَقَالَ: لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ، أَنْجَزَ وَعْدَهُ، وَنَصَرَ عَبْدَهُ، وَهَزَمَ الْأَحْزَابَ وَحْدَهُ، ثُمَّ دَعَا بَيْنَ ذلكَ. قَالَ مِثْلَ هَذَا ثَلاَثَ مَرَّاتٍ) الْحَدِيثُ.وَفِيهِ: (فَفَعَلَ عَلَى الْمَرْوَةِ كَمَا فَعَلَ عَلَى الصَّفَا)

उच्चारण (लिप्यंतरण)

Whenever the Prophet (ﷺ) approached Mount Safa, he would recite: Innaṣ-Ṣafā wa ‘l-Marwata min sha`ā'irillāh. Abda'u bimā bada'allāhu bih. He began (his Sa`y) at Mount Safa climbing it, until he could see the House. He then faced the Qiblah repeating the words: Lā ilāha illallāh, Allāhu Akbar Then he said: Lā ilāha 'illallāh waḥdahu lā sharīka lah, Lahu ‘l-mulku wa lahu ‘l-ḥamd wa Huwa `alā kulli shay'in Qadīr, lā 'ilāha illallāhu waḥdahu, anjaza wa`dahu, wa naṣara `abdahu, wa hazama ‘l 'aḥzāba waḥdah. Then he would ask Allah for what he liked, repeating the same three times. He did at Mount Marwah as he did at Mount Safa.

हिंदी अर्थ

जब नबी ﷺ सफ़ा के क़रीब पहुँचते तो पढ़ते: बेशक सफ़ा और मरवा अल्लाह की निशानियों में से हैं। मैं उसी से शुरू करता हूँ जिससे अल्लाह ने शुरू किया। आपने (अपनी सई) सफ़ा पहाड़ी से शुरू की और उस पर चढ़े यहाँ तक कि बैतुल्लाह को देख लिया। फिर क़िबले की ओर रुख़ करके ये कलिमात दोहराए: अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, और अल्लाह सबसे बड़ा है। फिर फ़रमाया: अल्लाह अकेले के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, उसका कोई साझी नहीं, उसी की बादशाहत है और उसी के लिए हर प्रशंसा है, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है। अल्लाह अकेले के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, उसने अपना वादा पूरा किया, अपने बंदे की मदद की, और अकेले ही लश्करों को शिकस्त दी। फिर जो चाहते अल्लाह से माँगते, और इसी तरह तीन बार दोहराते। मरवा पर भी आपने वही किया जो सफ़ा पर किया था।

कब और कैसे पढ़ें

हिस्न अल-मुस्लिम ने यह दुआ “सफ़ा और मरवा पर की दुआ” शीर्षक के अंतर्गत दी है।

स्रोत में दोहराने की कोई निश्चित संख्या नहीं दी गई है।

यह दुआ कहाँ से है?

यह दुआ हिस्न अल-मुस्लिम से है, जो क़ुरआन और सुन्नत की दुआओं का संग्रह है और सईद बिन अली अल-क़हतानी ने संकलित किया। स्रोत: Muslim 2/888।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

“सफ़ा और मरवा पर की दुआ” के अंतर्गत कौन-सी दुआ है?

“सफ़ा और मरवा पर की दुआ” के अंतर्गत आने वाली दुआ इस तरह शुरू होती है: “Innaṣ-Ṣafā wa ‘l-Marwata min sha`ā'irillāh”, और इसका अर्थ है: “बेशक सफ़ा और मरवा अल्लाह की निशानियों में से हैं। मैं उसी से शुरू करता हूँ जिससे अल्लाह ने शुरू किया”। स्रोत: Muslim 2/888, और यह हिस्न अल-मुस्लिम में संकलित है।

“सफ़ा और मरवा पर की दुआ” की दुआ का अर्थ क्या है?

बेशक सफ़ा और मरवा अल्लाह की निशानियों में से हैं। मैं उसी से शुरू करता हूँ जिससे अल्लाह ने शुरू किया। अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, और अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह अकेले के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, उसका कोई साझी नहीं, उसी की बादशाहत है और उसी के लिए हर प्रशंसा है, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है। अल्लाह अकेले के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, उसने अपना वादा पूरा किया, अपने बंदे की मदद की, और अकेले ही लश्करों को शिकस्त दी। फिर जो चाहते अल्लाह से माँगते, और इसी तरह तीन बार दोहराते। मरवा पर भी आपने वही किया जो सफ़ा पर किया था।

“सफ़ा और मरवा पर की दुआ” की दुआ कैसे पढ़ी जाती है?

उच्चारण (लिप्यंतरण): Innaṣ-Ṣafā wa ‘l-Marwata min sha`ā'irillāh. Abda'u bimā bada'allāhu bih. Lā ilāha illallāh, Allāhu Akbar Lā ilāha 'illallāh waḥdahu lā sharīka lah, Lahu ‘l-mulku wa lahu ‘l-ḥamd wa Huwa `alā kulli shay'in Qadīr, lā 'ilāha illallāhu waḥdahu, anjaza wa`dahu, wa naṣara `abdahu, wa hazama ‘l 'aḥzāba waḥdah. Then he would ask Allah for what he liked, repeating the same three times. He did at Mount Marwah as he did at Mount Safa.

“सफ़ा और मरवा पर की दुआ” की दुआ का स्रोत क्या है?

Muslim 2/888। यह दुआ हिस्न अल-मुस्लिम में है, जो क़ुरआन और सुन्नत की दुआओं का संग्रह है।

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