सुबह और शाम के अज़कार (25 में से 20)

सुबह और शाम के अज़कार। सुबह-शाम के अज़कार।

“सुबह और शाम के अज़कार” के अंतर्गत कौन-सी दुआ है?

हिस्न अल-मुस्लिम में “सुबह और शाम के अज़कार” के अंतर्गत आने वाली 25 दुआओं में से एक इस तरह शुरू होती है: “Lā ilāha illallāhu waḥdahu lā sharīka lah”, और इसका अर्थ है: “अल्लाह अकेले के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, उसका कोई साझी नहीं”। स्रोत: Al-Bukhari 4/95, और यह हिस्न अल-मुस्लिम में संकलित है।

सुबह और शाम के अज़कार: अरबी पाठ

لا إلهَ إلاّ اللّهُ وحْدَهُ لا شَريكَ لهُ،لهُ المُلْكُ ولهُ الحَمْد،وهُوَ على كُلّ شَيءٍ قَدير.(مائة مرة إذا أصبح)

उच्चारण (लिप्यंतरण)

Lā ilāha illallāhu waḥdahu lā sharīka lah, lahu ‘l-mulku walahu ‘l-ḥamd, wa huwa `alā kulli shay'in qadīr.

हिंदी अर्थ

अल्लाह अकेले के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, उसका कोई साझी नहीं। उसी की बादशाहत है और उसी के लिए हर प्रशंसा है और वह हर चीज़ पर क़ादिर है। (सुबह उठकर अरबी में सौ बार पढ़ें।)

कब और कैसे पढ़ें

हिस्न अल-मुस्लिम ने यह दुआ “सुबह और शाम के अज़कार” शीर्षक के अंतर्गत दी है।

स्रोत में दोहराने की कोई निश्चित संख्या नहीं दी गई है।

यह दुआ कहाँ से है?

यह दुआ हिस्न अल-मुस्लिम से है, जो क़ुरआन और सुन्नत की दुआओं का संग्रह है और सईद बिन अली अल-क़हतानी ने संकलित किया। स्रोत: Al-Bukhari 4/95।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

“सुबह और शाम के अज़कार” के अंतर्गत कौन-सी दुआ है?

हिस्न अल-मुस्लिम में “सुबह और शाम के अज़कार” के अंतर्गत आने वाली 25 दुआओं में से एक इस तरह शुरू होती है: “Lā ilāha illallāhu waḥdahu lā sharīka lah”, और इसका अर्थ है: “अल्लाह अकेले के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, उसका कोई साझी नहीं”। स्रोत: Al-Bukhari 4/95, और यह हिस्न अल-मुस्लिम में संकलित है।

“सुबह और शाम के अज़कार” की दुआ का अर्थ क्या है?

अल्लाह अकेले के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, उसका कोई साझी नहीं। उसी की बादशाहत है और उसी के लिए हर प्रशंसा है और वह हर चीज़ पर क़ादिर है। (सुबह उठकर अरबी में सौ बार पढ़ें।).

“सुबह और शाम के अज़कार” की दुआ कैसे पढ़ी जाती है?

उच्चारण (लिप्यंतरण): Lā ilāha illallāhu waḥdahu lā sharīka lah, lahu ‘l-mulku walahu ‘l-ḥamd, wa huwa `alā kulli shay'in qadīr.

“सुबह और शाम के अज़कार” की दुआ का स्रोत क्या है?

Al-Bukhari 4/95। यह दुआ हिस्न अल-मुस्लिम में है, जो क़ुरआन और सुन्नत की दुआओं का संग्रह है।

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