रोज़ेदार की दुआ जब उसे खाना पेश किया जाए और वह रोज़ा न तोड़े

रोज़ेदार की दुआ जब उसे खाना पेश किया जाए और वह रोज़ा न तोड़े। खाने से पहले और बाद, इफ़्तार।

“रोज़ेदार की दुआ जब उसे खाना पेश किया जाए और वह रोज़ा न तोड़े” के अंतर्गत कौन-सी दुआ है?

“रोज़ेदार की दुआ जब उसे खाना पेश किया जाए और वह रोज़ा न तोड़े” के अंतर्गत आने वाली दुआ इस तरह शुरू होती है: “--”, और इसका अर्थ है: “जब तुम्हें (खाने की) दावत दी जाए तो दावत क़ुबूल करो”। स्रोत: Muslim 2/1054, और यह हिस्न अल-मुस्लिम में संकलित है।

रोज़ेदार की दुआ जब उसे खाना पेश किया जाए और वह रोज़ा न तोड़े: अरबी पाठ

(إِذَا دُعِيَ أَحَدُكُمْ فَلْيُجِبْ، فَإِنْ كَانَ صَائِماً فَلْيُصَلِّ، وَإِنْ كَانَ مُفْطِراً فَلْيَطْعَمْ)، وَمَعْنَى فَلْيُصَلِّ أَيْ فَلْيَدْعُ.

उच्चारण (लिप्यंतरण)

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हिंदी अर्थ

जब तुम्हें (खाने की) दावत दी जाए तो दावत क़ुबूल करो। अगर रोज़े से हो तो (मेज़बान के लिए) अल्लाह से बरकत की दुआ करो, और अगर रोज़े से नहीं हो तो खा लो।

कब और कैसे पढ़ें

हिस्न अल-मुस्लिम ने यह दुआ “रोज़ेदार की दुआ जब उसे खाना पेश किया जाए और वह रोज़ा न तोड़े” शीर्षक के अंतर्गत दी है।

स्रोत में दोहराने की कोई निश्चित संख्या नहीं दी गई है।

यह दुआ कहाँ से है?

यह दुआ हिस्न अल-मुस्लिम से है, जो क़ुरआन और सुन्नत की दुआओं का संग्रह है और सईद बिन अली अल-क़हतानी ने संकलित किया। स्रोत: Muslim 2/1054।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

“रोज़ेदार की दुआ जब उसे खाना पेश किया जाए और वह रोज़ा न तोड़े” के अंतर्गत कौन-सी दुआ है?

“रोज़ेदार की दुआ जब उसे खाना पेश किया जाए और वह रोज़ा न तोड़े” के अंतर्गत आने वाली दुआ इस तरह शुरू होती है: “--”, और इसका अर्थ है: “जब तुम्हें (खाने की) दावत दी जाए तो दावत क़ुबूल करो”। स्रोत: Muslim 2/1054, और यह हिस्न अल-मुस्लिम में संकलित है।

“रोज़ेदार की दुआ जब उसे खाना पेश किया जाए और वह रोज़ा न तोड़े” की दुआ का अर्थ क्या है?

जब तुम्हें (खाने की) दावत दी जाए तो दावत क़ुबूल करो। अगर रोज़े से हो तो (मेज़बान के लिए) अल्लाह से बरकत की दुआ करो, और अगर रोज़े से नहीं हो तो खा लो।

“रोज़ेदार की दुआ जब उसे खाना पेश किया जाए और वह रोज़ा न तोड़े” की दुआ कैसे पढ़ी जाती है?

उच्चारण (लिप्यंतरण): --

“रोज़ेदार की दुआ जब उसे खाना पेश किया जाए और वह रोज़ा न तोड़े” की दुआ का स्रोत क्या है?

Muslim 2/1054। यह दुआ हिस्न अल-मुस्लिम में है, जो क़ुरआन और सुन्नत की दुआओं का संग्रह है।

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