इस्तिग़फ़ार और तौबा (6 में से 3)
इस्तिग़फ़ार और तौबा। इस्तिग़फ़ार, तस्बीह, तहमीद।
“इस्तिग़फ़ार और तौबा” के अंतर्गत कौन-सी दुआ है?
हिस्न अल-मुस्लिम में “इस्तिग़फ़ार और तौबा” के अंतर्गत आने वाली 6 दुआओं में से एक इस तरह शुरू होती है: “Astaghfirullāha ‘l-'Aẓīm”, और इसका अर्थ है: “मैं अज़मत वाले अल्लाह से बख़्शिश माँगता हूँ जिसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, जो हमेशा ज़िंदा और क़ायम रखने वाला…”। स्रोत: Abu Dawud 2/85, और यह हिस्न अल-मुस्लिम में संकलित है।
इस्तिग़फ़ार और तौबा: अरबी पाठ
उच्चारण (लिप्यंतरण)
Allah's Messenger (ﷺ) said: Whoever says: Astaghfirullāha ‘l-'Aẓīm alladhi lā ilāha illā huwa ‘l-ḥayyul-Qayyūm wa atūbu ilayh.
हिंदी अर्थ
अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: जो शख़्स यह कहे: मैं अज़मत वाले अल्लाह से बख़्शिश माँगता हूँ जिसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, जो हमेशा ज़िंदा और क़ायम रखने वाला है, और मैं उसकी ओर तौबा करता हूँ, अल्लाह उसे बख़्श देगा चाहे वह जंग की सफ़ों से भागा हो।
कब और कैसे पढ़ें
हिस्न अल-मुस्लिम ने यह दुआ “इस्तिग़फ़ार और तौबा” शीर्षक के अंतर्गत दी है।
स्रोत में दोहराने की कोई निश्चित संख्या नहीं दी गई है।
यह दुआ कहाँ से है?
यह दुआ हिस्न अल-मुस्लिम से है, जो क़ुरआन और सुन्नत की दुआओं का संग्रह है और सईद बिन अली अल-क़हतानी ने संकलित किया। स्रोत: Abu Dawud 2/85।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
“इस्तिग़फ़ार और तौबा” के अंतर्गत कौन-सी दुआ है?
हिस्न अल-मुस्लिम में “इस्तिग़फ़ार और तौबा” के अंतर्गत आने वाली 6 दुआओं में से एक इस तरह शुरू होती है: “Astaghfirullāha ‘l-'Aẓīm”, और इसका अर्थ है: “मैं अज़मत वाले अल्लाह से बख़्शिश माँगता हूँ जिसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, जो हमेशा ज़िंदा और क़ायम रखने वाला…”। स्रोत: Abu Dawud 2/85, और यह हिस्न अल-मुस्लिम में संकलित है।
“इस्तिग़फ़ार और तौबा” की दुआ का अर्थ क्या है?
मैं अज़मत वाले अल्लाह से बख़्शिश माँगता हूँ जिसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, जो हमेशा ज़िंदा और क़ायम रखने वाला है, और मैं उसकी ओर तौबा करता हूँ, अल्लाह उसे बख़्श देगा चाहे वह जंग की सफ़ों से भागा हो।
“इस्तिग़फ़ार और तौबा” की दुआ कैसे पढ़ी जाती है?
उच्चारण (लिप्यंतरण): Astaghfirullāha ‘l-'Aẓīm alladhi lā ilāha illā huwa ‘l-ḥayyul-Qayyūm wa atūbu ilayh.
“इस्तिग़फ़ार और तौबा” की दुआ का स्रोत क्या है?
Abu Dawud 2/85। यह दुआ हिस्न अल-मुस्लिम में है, जो क़ुरआन और सुन्नत की दुआओं का संग्रह है।
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